वर्मीफयूगोज -1
वर्मीफयूगोज -1
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क्र0 |
औषधिय पौधे |
अन्य नाम |
मात्रा प्रतिशत
में |
उपयोग |
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1 |
ALLIUM SATIVAM |
लहसून |
30 |
जीवाणु व संक्रामण रोधी |
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2 |
CHINOPODIUM
ANTHELMINITICUM |
गोजफुट |
5 |
ऑतों में कीडों |
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3 |
DICTAMNUS ALBUS |
डेटनी, वर्निग बुश, गैस प्लांट |
20 |
ऑतों में कीडे,त्वचा विकार |
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4 |
EUPHORBIUM OFFICINALIS |
डंडाधोरा, कैक्टस का
एक प्रकार |
5 |
ऑतों के मयुकस मैम्बरैंस
पर |
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5 |
IMPERATORIA OSTHRUTIUM |
मास्टर वॉर्ट, |
20 |
रोगाणु रोधक, ऑतों के म्यूकस पर, पेट में कीडे |
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`6 |
RUTA GRAVEOLEU |
सुदाब,सिताब, बाहीबूटी, सर्पदष्टा, पीत पुष्पा |
20 |
मसल्स पेन, गुदामार्ग में सूजन खुजली, |
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7 |
THYMUS SERPILLIUM |
जंगली अजवान, रेगने वाला अजवाईन,,ब्रेकलैड थाइम,वाइल्ड थाईम |
20 |
रोगाणुरोधी, एन्टीफंगल, एन्टी आक्सीडेन्ट, एंटी इफ्लेमेटरी,एंटी बैक्टेरिया |
वर्मीफयूगोज
-1 के निर्माण में जिन वनस्पतियों का प्रयोग किया गया है , उनमें अधिकतर ऐसी औषधीयॉ है, जिनका प्रभाव पेट में होने वालें कीडों व संक्रामण रोग
जो बैक्टेरिया आदि के कारण उत्पन्न होते है । बैक्टेरियल बीमारीयों के साथ
इसमें प्रयुक्त होने वाली कुछ औषधीयों का प्रभाव आंतों के म्युकस मैम्बरेन पर
होता है इससे आंतों के ग्लैण्ड, आंतों में रसों का स्त्रावों को बढा देते है इससे ऑतों
व मल द्वार में जमें हुऐ व्यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाते है । इसमें
प्रयुक्त वनस्पतियों का विस्तार से अध्ययन किया जाये तो हम इस नतीजे पर पहुचते
है इसमें पेट में होने वाले किसी भी प्रकार के कीडे चाहे वे सूत क्रिमी हो या
थ्रेड या फीत वर्म , या केचुवे की तरह के बडे बडे वर्म हो सभी को यह दवा
निकाल देती है । कुछ विद्वान चिकित्सकों का कहना है कि इसके प्रथम डायल्युशन से
पेट के कीडे मृत अवस्था में निकल जाते है । वही कुछ गृन्थकारों ने लिखा है कि
पेट के कीडों के लिये यह दवा एक ऐसा माहौल बना देती है जिससे वह उस स्थान को छोड
देते है । पेट में कीडों को पनपने के लिये उनके उपयुक्त वातावरण चाहिये होता है, जैसे मल का रूका होना या सडाद वाला वातावरण या फिर कीडों
के लिये उचित वातावरण आदि अत: इस दवा को देने से पेट के कीडे जिन्दा अवस्था में
ही बाहर निकल जाते है । जैसाकि पहले ही लिखा है कि यह ऑतों के म्युकस मैम्बरेन
से रस स्त्रावों ये रस स्त्राव ऑतों में जमे पदार्थो को मल द्वार तक ला कर मल
निस्कासन में सहायता करते है इससे यदि इस दवा को प्रथम डायल्युशन या स्पेरेजिक
रूप में देने से पेट में मरूर के साथ दस्त हो जाता है , इसलिये इसका उपयोग सावधानी से करना चाहिये वैसे दस्त
होने पर कीडों के साथ ऑतों में जमा मल भी निकल जाता है यदि यह अवस्था निर्मित हो
तो एस-10 व एस-3 देने से व इस दवा को बन्द कर देने से उपरोक्त समस्या का निदान
हो जाता है । यह दवा पेट में कीडों के साथ संक्रामण बैक्टेरिया, वायरस आदि पर भी प्रभावित है अत: किसी भी प्रकार के
वायरल संक्रामक बीमारीयों में वायरस व बैक्टेरिया से बचाने में यह सहायक है ।
बैक्टेरिया की वजह से किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह टी बी हो खॉसी , या अन्य प्रकार की बीमारी जो बैक्टेरिया या संक्रामण
की वजह से हो उसमें इस दवा का प्रयोग अन्य सहायक औषधियों के साथ किया जा सकता है
। हैजा उल्टी दस्त स्कीन की बीमारीयॉ खुजली , सूखी
हो या गीली, ऑखों के संक्रामण में , बबासीर
फिस्टूला या अन्य प्रकार के संक्रामित धावों के उपचार में भी इसका प्रयोग अन्य
सहायक औषधीयों के किया जा सकता है । भूंख का कम लगना या अत्याधिक लगना , बच्चों के पेट में कीडे होने पर रात्री में चौक जाना , नाक खुजलाना ,सोते
समय मुंह से लार गिरना, शरीर में दरोरे पडना यह बडे लोगों में भी हो सकता है ।
पेट में कीडे होने पर बच्चा कुछ भी खाये पिये दिनो दिन सूखता जाता है व उसे भूख
बहुत लगती है मलद्वार में कीडों के कॉटने से खुजली होती है । यदि ब्रेन में पेट
में कीडे हो तो इस दवा का प्रयोग किया जा सकता है ,या
बुखार किसी इंफेक्शन या संक्रामण रोग की वजह से हो इसका प्रयोग अवश्य करे , यूटीआई की समस्याओं में भी इसका प्रयोग अन्य सहायक
दवाओं के साथ किया जा सकता है । इस दवा का प्रयोग श्वसन तंत्र के संक्रामण जिसमें
खॉसी ,दमा, सूखी खॉसी, गीली
खॉसी आदि में इसका प्रयोग पी ग्रुप की दवाओ के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये
जा सकते है । त्वचा रोगों में जिसमें एग्जीमा, सूखी
खुजली , त्वचा में ददोरे, भी
इसका प्रयोग एस-3 सी-3 दवाओं व एपीपी के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते
है । कब्ज होने पर इसका प्रयोग एसलॉस , वाई ई , एस-2 गरम पानी के साथ करने पर एक दो दिन में उचित परिणाम
मिलने लगता है ।
डॉ0कृष्णभूषण सिंह चन्देल
मो0 9926436304
nice sir ji
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